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बिलखती आंखों की यही पुकार, मेरे बच्चे बचा लो सरकार

50मेरे बच्चे को बचा लो साहब…देखो न कैसे-कैसे कर रहा है…हम गरीब हैं…हमारे आप ही सबकुछ हैं…आप सुनते क्यों नहीं….और दारुण आवाज के साथ क्रंदन करती मां अस्पताल के दहलीज पर अपने माथे को पटकती रह जाती है…मगर किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। कुछ पल जैसे ही गुजरा कि अस्पताल के किसी वार्ड से दिल को दहलाने वाली मां की चित्कार ने सबको रुला कर रख दिया। कहां हैं सरकार, हम किस हालत में हैं देखने तो आईये, कोई उपाय तो कीजिए कि मेरा लाल बच जाए। अगर इसे कुछ हो गया तो हम किसके सहारे जिएंगे….

मुजफ्फरपुर हमेशा से मौत का चश्मदीद बनता रहा है। चमकी बुखार कोई नई बात नहीं है। बल्कि इससे पहले भी यहां कई गंभीर बीमारियों की चपेट में नौनिहालों ने दम तोड़ा है। राजनेताओं एवं पदाधिकारियों के लिए भले ही यह एक घटना मात्र हो, मगर एक मां की गोद सुनी होने पर उनके दिल पर क्या गुजरती है शायद उसकी सिसकियों को सुनने वाला आज तक इसे समझ नहीं पाया।

  • मजफ्फरपुर में बच्चों की हो रही मौत, सरकारी व्यवस्था पर उठा रहा सवाल
  • पिछले कई वर्षों से बीमारियों के निदान के लिए नहीं निकाला गया कोई उपाय
  • ज्यादातर गरीब परिवार के बच्चे हो रहे हैं इसके शिकार

उत्तर बिहार की राजधानी कही जाने वाली मुजफ्फरपुर से सभी परिचित हैं। यह वही मुजफ्फरपुर है जहां सबसे कम उम्र के देशभक्त खुदीराम बोस ने अपनी आने वाली पीढ़ियों की आजादी के लिए खुद को कुर्बान कर दिया था।  आज उसी भूमि पर लगातार चमकी बुखार की चपेट में आकर मासूम दम तोड़ रहे हैं और सूबे की सरकार केवल आश्वासन की घूंट पिला रही है। मुजफ्फरपुर में इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) के चलते मौत का आंकड़ा बढ़ रहा है। सरकारी और गैर सरकारी अस्पतालों में स्थिति भयावह बनी हुई है। मरीज के परिजन परेशान हैं, मगर सरकार निश्चिंत होकर सूबे के विकास की बात करके बैठकों का हिस्सा बन रही है। सरकारी आंकड़े सौ को पार कर गई है अगर सही मायनों में देखें तो मरने वाले बच्चों की संख्या इससे बहुत ज्यादा तक पहुंच गई है।

अस्पताल के दरवाजे पर जैसे ही कोई बड़ी गाड़ी आकर रुकती है परेशान मरीज के परिजनों की आंखों में उम्मीद की किरण जाग उठती है कि कोई न कोई उनके बीमार मासूम को जरुर बचा लेगा। लेकिन ऐसा नहीं होता साहब, होता है तो बस आगे क्या किया जाए जिससे किसी प्रकार के होने वाले प्रकोप से बचा जा सके इस पर चर्चाओं का बाजार गर्म हो जाता है। खबरों में आए लोगों की खबरें सुर्खियों में छा जाती हैं। मगर एक बार दिल पर हाथ रखकर सोचना होगा कि अगर इस अस्पताल में किसी का कोई अपना होता तो क्या सरकारी नुमाइंदे ऐसे ही आकर, घोषणाएं करके चले जाते। इन सभी बातों से कुछ नहीं होने वाला है। अभी मासूमों को बचाने के लिए इन गरीबों, मजलूमों को अपनी सरकार से ज्यादा अब ऊपरवाले भरोसा है कि अब वही कुछ कर सकता है, ये तो सिर्फ राजनीतिक गोटियों सेंक कर चले जाएंगे।

मुरली मनोहर श्रीवास्तव / (लेखक सह पत्रकार) /पटना

नोट :  लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से सामना एक्टिविस्ट का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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