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Dr.Saeeda Wasim, Fertility Consultant at Nova IVI Fertility, Lucknow-02 cut

संतानहीन कपल्स को मिल रहा संतान-सुख, फर्टिलिटी उपचारों के चलते दूर हो रहे मिथक

Dr.Saeeda Wasim, Fertility Consultant at Nova IVI Fertility, Lucknow-02लखनऊ: इनफर्टिलिटी एक वर्ष तक असुरक्षित यौन संबंध बनाने के बावजूद संतान पैदा न हो पाने की अक्षमता है. भारत में यह चिंता का एक बड़ा विषय बन चुका है और लगभग 4-17 प्रतिशत भारतीय कपल्स इनफर्टिलिटी की समस्या से पीड़ित हैं. हालांकि प्रभावित कपल्स में से मात्र 1 प्रतिशत कपल्स गर्भधारण हेतु आईवीएफ (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) या फर्टिलिटी के लिए किसी अन्य उपचार का सहारा ले रहे हैं. हमारे समाज में, जहां इनफर्टिलिटी को एक कलंक माना जाता है, वहां इनफर्टिलिटी से जुड़े उपचारों को लेकर अनेक मिथक प्रचलित हैं. इन मिथकों में कई ऐसे हैं, जैसे-इनफर्टिलिटी की समस्या केवल महिलाओं से जुड़ी है, आईवीएफ तकनीक से पैदा हुए शिशु व उसकी मां के स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं भी शामिल है.
नोवा इवी फर्टिलिटी की मदद से लखनऊ में उन्नत तकनीक से हो रहा उपचार
इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) एक प्रकार का असिस्टिव रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी है जिसमें महिला के अंडाशयों से अंडाणुओं को निकालकर शुक्राणुओं से उनका निषेचन कराना शामिल होता है. निषेचित अंडाणु को भ्रूण के रूप में जाना जाता है, जिसे स्टोर के लिए फ्रीज कर दिया जाता है या महिला के गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया जाता है.  इस बारे में आईवीएफ उपचार से जुड़े मिथकों के बारे में डॉ. सईदा वसीम (फर्टिलिटी कंसल्टेंट, नोवा इवी फर्टिलिटी, लखनऊ)  ने बताया कि इनफर्टिलिटी का पता लगने का मतलब यह नहीं है कि आपकी संतान की इच्छा अब कभी पूरी नहीं हो सकती है. अधिकांश मामलों में इनफर्टाइल कपल्स असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (आर्ट) के जरिए गर्भधारण कर सकते हैं. हालांकि हमारे समाज में इनफर्टिलिटी से जुड़ी व्याप्त विभिन्न भ्रांतियों के मद्देनजर, अभी भी कई मिथक बने हुए हैं और फर्टिलिटी से पैदा हुए शिशु एवं उसकी मां के स्वास्थ्य को लेकर तमाम तरह की स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में कहा-सुना जाता है. रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी में प्रगति के चलते आज इनफर्टिलिटी का उपचार काफी हद तक सफल हो सका है जिससे हजारों निस्संतान कपल्स के मन में उम्मीद की किरण जगी है. एआरटी के जरिए होने वाले इनफर्टिलिटी उपचारों में उच्चतम मानक नीतियों का पालन किया जाता है और यह शिशु एवं मां दोनों के लिए ही सुरक्षित है.
डॉ. सईदा इन सम्मेलन में निम्नलिखित मिथकों जैसे-आईवीएफ प्रिग्नेंसीज के मामलों में हमेशा सीजेरियन सेक्शन डिलिवरी होता है, आईवीएफ के जरिए हमेशा जुड़वे बच्चे पैदा होते हैं, कंप्लीट बेड रेस्ट के चलते आईवीएफ की सफलता की संभावना बढ़ जाती है, आईवीएफ के जरिए पैदा हुए शिशुओं में असामान्यताओं का अधिक खतरा होता है पर भी चर्चा की और सही पहलू बताये. उन्होंने आगे कहा कि इसके अलावा महिलाओं में अधिक उम्र के मामलों में (35 वर्ष से अधिक) या विशिष्ट आनुवांशिक विकारों के इतिहास के साथ जोड़े (थैलेसीमिया, कुछ प्रकार की मांसपेशियों की डिस्ट्रोफी आदि) उन्नत एआरटी तकनीक जैसे प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक परीक्षण में गुणसूत्र त्रुटियों का सटीक पता लगाने की अनुमति देता है. भ्रूण या विशिष्ट आनुवंशिक असामान्यता हस्तांतरण से पहले, एक स्वस्थ और गुणसूत्र सामान्य बच्चे की संभावना बढ़ जाती है।वस्था की सामान्य देखभाल की जानी चाहिए.

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