July 24, 2021

घरों तथा आस-पास सुख-दुःख के साथी पशु पक्षियों के लिए रखें दाना-पानी

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लखनऊ। लोक विश्वास में पशु-पक्षी मनुष्य के सहचर हैं। हंस मन का प्रतीक है, कौआ संदेशवाहक है, कोयल और पपीहा दर्द के गायक हैं। पक्षियों को आभास हो जाता है कि कहां अमंगल होने वाला है। आदि काल से लिखित व वाचिक साहित्य में, पंचतंत्र की कथाओं में पशु पक्षियों के अनेक प्रसंग मिलते हैं। ये हमारे सुख-दुःख के साथी और प्रकृति के अभिन्न अंग हैं।

पशु-पक्षी और लोक जीवन विषयक संगोष्ठी में की गयी अपील

ये बातें वरिष्ठ साहित्यकार डा. विद्या विन्दु सिंह ने रविवार को लोक संस्कृति शोध संस्थान की 27वीं लोक चौपाल में कहीं। रविवार को आनलाइन आयोजित लोक चौपाल में पशु-पक्षी और लोक जीवन पर चर्चा हुई।

चौधरी के रूप में सम्मिलित संगीत विदुषी प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव, लोक विदुषी डा. विद्या विन्दु सिंह व लोक साहित्य मर्मज्ञ डा. रामबहादुर मिश्र ने पशु-पक्षी और उनके मानवीय अंतरसम्बन्धों पर चर्चा करते हुए पशु-पक्षियों के संरक्षण पर जोर दिया।

सुख-दुःख के साथी हैं पशु पक्षी : विद्याविन्दु सिंह

लोक संस्कृति शोध संस्थान की सचिव सुधा द्विवेदी ने कहा कि भीषण गर्मी के मौसम में जल स्रोतों के सूख जाने के कारण पशु-पक्षी दाना पानी न मिलने से असमय काल कवलित हो जाते हैं। अनेक पशु-पक्षियों की प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और कई विलुप्ति कीे कगार पर हैं।

ये पशु-पक्षी हमारे पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं, इनकी देख-रेख की जिम्मेदारी व सुरक्षा करना हमारा नैतिक दायित्व है, ऐसे कार्यों में समाजसेवी व्यक्तियों और संगठनों को आगे आकर अपना सहयोग करना चाहिए तथा जनता को भी अपने घरों तथा आस-पास पशु पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करना चाहिए।

संगोष्ठी में डा. रामबहादुर मिश्र ने लोककथा चिरई सुनाई। डा. अपूर्वा अवस्थी, चित्रा जायसवाल, डा. सुरभि सिंह, इन्दु सारस्वत, प्रो. विनीता सिंह ने भी अपने विचार रखे।

गीत-संगीत में भी दिखा पक्षियों का कलरव

चौपाल में पशु-पक्षियों से जुड़े गीत-संगीत की मनमोहक प्रस्तुतियां हुईं। शुरुआत संगीत विदुषी प्रो. कमला श्रीवास्तव ने मुण्डेरे पर कागा बोले भिनुसारे तथा कोयल तोरी बोलिया मीठ मीठ लागे… से की।

लोक गायिका मधु श्रीवास्तव ने अरी अरी कारी कोयलिया अंगन मोरे आवहु हो, इन्दु सारस्वत ने छोटी छोटी गइया और निबिया कै बिरवा पे बोले कोयलिया, अरुणा उपाध्याय कोयल अमवा के डारी देखो कुहुके सजनी, पूनम सिंह नेगी ने काले भंवरे ने कली चटकाई, वरिष्ठ लोक गायिका अरी अरी काली कोयलिया नेवत देई आवहु हो, चित्रा जायसवाल ने सखी री मैं तो उड़ जाती, मंजू श्रीवास्तव मोरे अंगना में बोल उठा काग सगुन शुभ मंगल हुआ, रुपाली रंजन श्रीवास्तव अटरिया पर बोल रहा कागा बलम मोरा अब लौं न आये, सुधा द्विवेदी ने अरे रामा मोर मचावत सोर बदरिया छायी रे हरी, रेखा अग्रवाल ने तनी ललकार के बैला हांको मोरा सैयां गाड़ीवान, रेखा मिश्रा ने उड़ी जाओ रे सुगनवा गंगा पार, अंजलि सिंह ने बोलन लागी कोयलिया झूम झूम के बरसन लागी रे बदरिया झूम झूम के, सुनीता पांडेय ने कोयल बोले हरी डाल पे, रेनू दुबे उड़ जा सुगनवां माई के भुवन, युवा लोक गायक गौरव गुप्ता ने पंजाबी गीत मोर तेरे बागां दा, ज्योति किरन रतन ने कागा ले जा संदेशा पिया जी के पास, संगीता खरे ने वर खोजाई गीत सावन सुगना में घीउ गुड़ पालऊं, डा. विनीता सिंह ने राम सिया के मधुर मिलन में फुलवारी मुसकाये कोयलिया कूक सुनाये, कल्पना सक्सेना ने रस ले गया भंवरवा सुनाया।

पर्यावरण के प्रति लोक चेतना जागृत करना आवश्यक : प्रो.दीक्षित

अपर्णा सिंह, शालिनी सिंह, रीता पांडेय ने भी गीत सुनाये। नृत्यांगना श्रेया बिन्दल ने बन के तितली उड़ी तथा वागीशा पन्त ने कोयलिया कुहुक उठी पर मनमोहक नृत्य प्रस्तुत किया। काव्य पाठ के क्रम में बाल कवयित्री स्वरा त्रिपाठी ने आओ फिर से आंगन में गौरेया को बुलायें सुनाया।

वरिष्ठ कवि शिवपूजन शुक्ल ने मास असढ़वा के पहली बदरिया, सरिता अग्रवाल ने काली कोयल बैठी आम डाल पर, उमा त्रिगुणायत ने तोता हरे रेग का होता जिसको पाल रहे काका, गीतकार संजय अवधी ने अवधी बाल गीत आव चिरैया खाना दी…. प्रस्तुत किया। चौपाल में हरिकृष्ण गुप्ता, डा. भारती सिंह, टीटी सुनील, हेमलता त्रिपाठी, स्नेह बिन्दल, अनिता श्रीवास्तव, आशा श्रीवास्तव, डॉ.एसके गोपाल आदि की प्रमुख उपस्थिति रही.


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