July 24, 2021

पारम्परिक कजरी, झूला गीतों से सजी आनलाइन महफिल

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लखनऊ। लोक संस्कृति शोध संस्थान की 28वीं लोक चौपाल में मनभावन सावन और परम्पराएं विषय पर चर्चा के साथ ही पारम्परिक कजरी व झूला गीतों की प्रस्तुतियां हुईं.

रविवार को आनलाइन आयोजित लोक चौपाल में चौधरी के रूप में सम्मिलित संगीत विदुषी प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव, लोक विदुषी डा. विद्या विन्दु सिंह व लोक साहित्य मर्मज्ञ डा. रामबहादुर मिश्र ने पावस ऋतु की लोक परम्पराओं को जीवन की सरसता का अनिवार्य अंग बताया. वरिष्ठ साहित्यकार डा. रामबहादुर मिश्र ने कहा कि कृषि प्रधान देश भारत के लिए पावस ऋतु का सर्वाधिक महत्त्व है.

लोक चौपाल में रिमझिम सावन का स्वागत

आषाढ़, सावन, भादो और क्वार, पावस के ये चार महीने लोक में चौमासा के रूप में जाने जाते हैं. पावस धन-धान्य से पूरित करने वाली ऋतु है जिसमें विशेष रूप से प्रकृति पूजा का विधान है. इसमें सावन पर बहुत सारा साहित्य रचा गया है जिसमें लोक गीतों का प्राधान्य है. सावन का स्वागत करते हुए कामना करनी चाहिए कि हमारे बारहों माह हरीतिमायुक्त रहें.

कथा रंग की डा. अपूर्वा अवस्थी ने सावन मास के पौराणिक महत्व की जानकारी देते हुए कहा कि तप्त धरा पर जब बारिश की फुहारें पड़ती हैं तो तन और मन आनंदित होते हैं और कंठ से स्वयं ही गीत प्रस्फुटित होने लगते हैं। हरी चूड़ी, लाल मेंहदी, झूले, मायके का नीम और आंगन याद आने लगता है.

पिया सावन में झूला लगाई द हमके झुलाई द ना….

वरिष्ठ साहित्यकार डा. विद्या विन्दु सिंह ने भारतीय ऋतु चक्र को प्रकृति का अनमोल उपहार बताते हुए पारम्परिक कजरी गीत सुनाया। रंजना शंकर ने महादेवी वर्मा के बारहमासा कविता में निहित चौमासा के मनोहर भाव की चर्चा की. डा. सुरभि सिंह ने सावन के महात्म्य और लोक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का वर्णन किया, लोक गायिका कुसुम वर्मा ने सावन की हरियाली और लोक संगीत पर अपने विचार रखे.

पावस गीतों में समायी है जीवन की सरसता

चौपाल के सांगीतिक सत्र में गीत और नृत्य की प्रस्तुतियां बहुत सराही गयीं. शुभारम्भ संगीत विदुषी प्रो. कमला श्रीवास्तव ने डॉ. विद्याविन्दु सिंह के लिखे गीत अरे रामा रामचन्द्र संग झूला झूले सीता जनक दुलारी ना से की. स्वरा त्रिपाठी ने झूम के बरसे पनिया हो तथा श्रेया बिन्दल ने सावन का महीना गीत पर मनमोहक नृत्य प्रस्तुत किया.

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सावन गीतों की प्रस्तुति श्रृंखला में अम्बुज अग्रवाल ने झूला झूले कृष्ण मुरारी, विभा श्रीवास्तव ने अरे रामा झूले कन्हैया, अंजलि सिंह ने अबकी सावन में झुलनी गढ़ाई द पिया, इन्दू सारस्वत ने कइसे जाऊँ मैं बजरिया, मधु श्रीवास्तव ने आयो री मास सुहावन रे सखी, कुसुम वर्मा ने अरे रामा रिमझिम, चित्रा जायसवाल ने रंगइबे धानी चुनरी, रुपाली श्रीवास्तव ने घर से चल गुजरिया, रीता पांडेय ने झूला कुज वन डारो री, रंनू दुबे ने घिर घिर आई कारी बदरिया, रेखा अग्रवाल ने जल भरन हिडांलना जाए रसरिया रेशम की, पूनम सिंह नेगी ने पिया सावन में झूला लगाई द हमके झुलाई द ना सुनाया.

गोण्डा निवासी वरिष्ठ लोक गायक शिवपूजन शुक्ल ने गोरी मेंहदी ले अइबे बाजार से, अरुणा उपाध्याय ने सइयां न आये सवनवां मा, सरिता अग्रवाल ने हो सखी बरसे झमाझम, सावित्री बाजपेयी ने वंशी बाज रही वृन्दावन तथा उमा त्रिगुणायत ने ब्रज के पारम्परिक मल्हार देखो री मुकुट झोटा लै रहयो सुनाया.

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वरिष्ठ लोक गायिका नीरा मिश्रा ने अबके सावन सइयां घर से ना निकलो, अपर्णा सिंह ने कइसे खेलन जइबू सावन में कजरिया, संगीता खरे ने अरे रामा रिमझिम परत फुहार, नवनीता ज़फा ने ओ री हरि कित गयो नेहा लगाय, अंशुमान मौर्य ने झूला झूले कृष्ण मुरारी, मंजू श्रीवास्तव ने अरे रामा सरजू जी के धारा अपरम्पारा रे हरी, कुमकुम मिश्रा ने कइसे खेलन जइबू, शारदा पाण्डेय ने सांवरिया घर नाहीं आये री, सुषमा प्रकाश ने घेरि घेरि आई कारी बदरिया, रेखा मिश्रा ने चौमासा गीत प्रथम मास आषाढ़ रे सखी, सुनीता पांडेय ने नन्हीं नन्हीं बुंदिया रे, उषा पांडिया ने अरे रामा कृष्ण बने मनिहारी, सुरभि सिंह ने सावन के झूले पड़े, सुधा द्विवेदी ने कोयल बिन बगिया ना सोहे राजा, लीला श्रीवास्तव ने बुंदन भीजे मोरी साड़ी, शक्ति श्रीवास्तव ने अबकी सावन सइयां तथा निधि निगम ने उमड़ के आवे रे ननदी सुनाया। चौपाल में लोक संस्कृति शोध संस्थान की सचिव सुधा द्विवेदी, गौरव गुप्ता, संगीता आहूजा, एसकेगोपाल आदि उपस्थित रहे.


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