July 28, 2021

भारतीय पहचान के तत्त्वों में प्रमुख है प्रकृति के प्रति संवेदना की धर्म दृष्टि

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लखनऊ। भारतीय पहचान के तत्त्वों में प्रकृति के प्रति संवेदना की धर्म दृष्टि प्रमुख रही है। सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य कला, रीति-रिवाजों में यह समानता मिलती आ रही है। ईश्वर की भक्ति में रचा गया साहित्य संस्कृत से लेकर आधुनिक भाषाओं तक में आज तक प्रकृति से ओत-प्रोत रही है।

कुंज करीलों में, कदम्ब की डाल पर, यमुना तट पर, वन में, गोचारण में, गंगा के जल विन्दु में, तीर्थों में, चर अचर सम्पूर्ण सृष्टि में सर्वत्र गोविन्द का दर्शन करने वाली भारतीय धर्म दृष्टि इसीलिए अनूठी है। आज आवश्यकता है कि उस दृष्टि की ओर से आँखें मूँद लेने वाले मनुष्य की आँखें खोलने की। इसीलिए महामारी, प्रलय, प्राकृतिक आपदाओं ने चेतावनी दे दी है।

श्री कृष्ण प्रताप सिंह स्मृति अध्यात्म चिंतन व्याख्यानमाला का आयोजन

ये बातें आज श्री कृष्ण प्रताप सिंह स्मृति अध्यात्म चिंतन व्याख्यानमाला में वक्ताओं ने कहीं। कृष्णप्रताप-विद्याविन्दु लोकहित न्यास, शिव सिंह सरोज स्मारक समिति एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित समारोह के दौरान पत्रकारिता, साहित्य, पर्यावरण, कला सहित विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए 12 विभूतियों को सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर संत विवेक स्मारिका, डॉ. विद्या विन्दु सिंह की बाल कविताओं के संकलन गुल्ली डंडा रेत में तथा डॉ. करुणा पाण्डे के कहानी संग्रह अधूरा कैनवास का लोकार्पण भी हुआ।  कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्रीधर पराड़कर ने धर्म को जड़ और चेतन में व्याप्त बताते हुए वृक्ष, जीव-जन्तु के प्रति मानवीय कत्र्तव्यों के अनुपालन पर जोर दिया।

12 विभूतियां सम्मानित, तीन पुस्तकों का लोकार्पण

वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने भारतीय दर्शन के परिप्रेक्ष्य में प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों पर विसतार से प्रकाश डाला।  प्रो. कमला श्रीवास्तव व विजय कर्ण के स्वस्तिवाचन और स्वरा त्रिपाठी की सरस्वती वन्दना से कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ।

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इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र की निदेशक प्रो. मौलि कौशल ने बीज वक्तव्य में पृथ्वी सूक्त की व्याख्या करते हुए कहा कि पाश्चात्य सभ्यता के कलुषित प्रभावों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रकृति के मूल स्वरूपों की रक्षा जनजातियों तथा लोक परम्पराओं में मिलती है।
पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने गीत के माध्यम से प्रकृति का चित्रण करतेहुए कहा कि प्रकृति से प्रेरणा नहीं ली जाती वरन उसे जिया जाता है।

अरविन्द चतुर्वेदी ने ईश्वर की सत्ता, आहार के शुद्धिकरण व सात्विकता के महत्त्व पर चर्चा की। डॉ. पूर्णिमा पाण्डे ने कहा कि प्रकृति के प्रति हमने जो गलतियां की हैं उनका सुधार करना होगा। डॉ. योगेन्द्र प्रताप सिंह ने सन्त विवेक स्मारिका के बारे में बताया।

मुख्य अतिथि डॉ. कन्हैया सिंह, आनन्दवर्द्धन सिंह, डॉ. एस. शेषारत्नम,, शशिप्रकाश सिंह, राकेश शर्मा, श्री यतीन्द्र मिश्र, डॉ. गायत्री सिंह, अनिल कुमार पाण्डे आदि ने अपनी बात रखी।

कार्यक्रम में अखिल भारतीय साहित्य परिषद के पवनपुत्र बादल, विजय त्रिपाठी, शिव सिंह सरोज स्मारक समिति की महामंत्री श्रीमती रमा सिंह, धर्म भारती राष्ट्रीय शान्ति विद्यापीठ के निदेशक डा. सत्येन्द्र कुमार सिंह, लोक संस्कृति शोध संस्थान की सचिव सुधा द्विवेदी, शांति सेवा एवं संस्कृति जागरूकता मिशन के अध्यक्ष आनन्द शुक्ल भी सम्मिलित रहे। धन्यवाद ज्ञापन सुनील देव सिंह ने किया। आयोजन के विभिन्न सत्रों का संचालन डॉ. करुणा पाण्डे, डॉ. भारती सिंह एवं डॉ. एस.के. गोपाल ने किया।

इन्हें मिला सम्मान :

  •  के. विक्रम राव : श्री शिव सिंह सरोज स्मृति श्रीवत्स् कर्मयोगी सम्पादक मनीषी सम्मान
  • प्रो. हरिशंकर मिश्र : डॉ. विद्यानिवास मिश्र स्मृति श्रीवत्स कर्मयोगी चिन्तक मनीषी सम्मान
  • शिवशरण दीक्षित :  श्री कृष्ण प्रताप सिंह स्मृति श्रीवत्स् कर्मयोगी ऋषि सम्मान
  • जया विजया श्रीवास्तव : श्री दिल बहाल सिंह स्मृति श्रीवत्स देशभक्त हुतात्मा परिजन सम्मान
  • डॉ. कैलाश देवी सिंह : श्री देवनारायण सिंह स्मृति श्रीवत्स साहित्य मनीषी शिक्षक सम्मान
  • श्रुति मालवीय : श्रीमाँ प्रभु देवी स्मृति श्रीवत्स लोकसंगीत मनीषी सम्मान
  • ज्योति किरन रतन : श्रीमाँ प्राण देवी स्मृति श्रीवत्स लोककला मनीषी सम्मान
  • प्रो. उषा बाजपेयी : प्रो. शिवमंगल सिंह स्मृति श्रीवत्स पर्यावरण संरक्षक सम्मान
  • डॉ. सत्यवीर सिंह : डॉ. कुँवर यशवीर सिंह स्मृति श्रीवत्स कर्मयोगी स्वास्थ्य सेवा सम्मान
  • सूर्यभानु सिंह गौतम : श्री राजेन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव ‘भइयाजी’ स्मृति श्रीवत्स कर्मयोगी समाजसेवी सम्मान
  • श्री राजेन्द्र नाथ बक्शी : श्री शचीन्द्र नाथ बक्शी स्मृति श्रीवत्स शहीद स्मृति संरक्षक सम्मान
  • सूसम्मा जॉय : डॉ. दिवाकर सिंह स्मृति श्रीवत्स लोकसेवा सम्मान

 


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