July 24, 2021

जनकल्याणकारी हैं जैन शास्त्रों के उपदेश

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लखनऊ। उप्र जैन विद्या शोध संस्थान की ओर से ‘‘श्रुत पंचमी जैन शास्त्रों का लेखन’’ विषय पर वेबीनार का आयोजन मंगलवार को किया गया. वेबीनार में वाराणसी के प्रो. फूलचन्द्र, प्रेमी ने अपने अध्यक्षीय संवाद में कहा कि महावीर के वाद जैन दर्शन के सूत्रों का लेखन ब्राह्मी लिपि में हुआ. भाषा विकास के साथ ही उत्तरोत्तर विभिन्न भाषाओं में जैन दर्शन शास्त्रों का विकास हुआ.

अहिंसा और करूणा के श्रोत हैं जैन शास्त्र

संस्थान के उपाध्यक्ष प्रो.(डॉ.) अभय कुमार जैन विषय प्रवर्तन करते हुये बताया कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के काल से अन्तिम तीर्थंकर महावीर तक सत्य ,अहिंसा और शाकाहार के उपदेश गुरुकुलों में शास्त्रोक्त विधि से कण्ठस्थ कराये और समझाये जाते थे. पहली सदी श्रुत आचार्य धरसेन को अनुभूति होने लगी कि आगे आने वाले समय में जनकल्याणकारी उपदेश यथावत आम लोगों तक पहुंचने चाहिए.

‘श्रुत पंचमी जैन शास्त्रों का लेखन’’ विषय पर वेबीनार का आयोजन

धरसेनाचार्य ने योग्य शिष्यों पुष्पदन्त एवं भूतबलि को आशीर्वाद देकर जैन सिद्धांतों को लिपिबद्ध करने को कहा. लौकिक एवं पारलौकिक ज्ञान से संचित ग्रन्थ को छः खण्डों में पूर्ण कर शिष्यों ने षट्खण्डागम को गुरुवर को जेष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन पूजन कर प्रस्तुत किया. आगम के इस शास्त्र की पूजा, अर्चना एवं वाचन सभी जैनधर्माबलम्बी श्रुतपंचमी को कर धन्य होते हैं.

मुख्यवक्ता दिल्ली के प्रो. वीर सागर जैन कहा कि हमारे पूर्व आचार्यों ने शास्त्रो की समय समय पर विभिन्न भाषाओं में रचना कर हम सब पर  बहुत बड़ा उपकार किया है.  दान और करूणा की प्रेरणा देने में जैनशास्त्रों की उपयोगिता अत्यन्त अधिक है. अतिथि वक्ता मेरठ के डॉ. मनीष जैन,  ने बताया कि जैन शास्त्रों का मूल अहिंसा पर केन्द्रित है.

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लाडनूं (राज.) के प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठ ने कहाकि हम सौभाग्यशाली हैं कि हमें अहिंसा एवं सत्य का स्वरूप जैन साहित्य से सतत् मिल रहा है. खतौली की डॉ. ज्योति जैन, लखनऊ के प्रो. विजय कुमार जैन, डॉ. पत्रिका जैन ने कहा कि षट्खण्डागम से से ही वर्तमान समय के शास्त्रों का उद्भव हुआ है.

अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के अध्यक्ष भदन्त शान्तिमित्र आशीर्वाद प्रदान करते हुये कहा कि जैन शास्त्रों में वर्णित अहिंसा और सत्य का स्वरूप मानवीयता को बढ़ाता है.  संस्थान के निदेशक डॉ. राकेश सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुये कहा कि जैन संस्थान के पुस्तकालय में प्राचीन ग्रन्थ और उनकी टीकायें शोधार्थियों के लिए उपलब्ध हैं.


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