July 23, 2021

जब पाकिस्तान से हारती थी टीम तो मोहम्मद शाहिद के घर में नहीं जलता था चूल्हा

फाइल फोटो सोशल मीडिया

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश स्पोर्ट्स हॉस्टल (केडी सिंह बाबू स्टेडियम) लखनऊ की देन मोहम्मद शाहिद ने लगातार तीन 1980, 1984 और 1988 में ओलंपिक में खेले। वह 1980 में मास्को में भारत की स्वर्ण पदक  विजेता हॉकी टीम में भी थे। 1984 में भारत की टीम गलत अंपायरिंग फैसलों के कारण पांचवें स्थान पर रही थी।

मॉडर्न हॉकी के बेहतरीन ड्रिब्लर, आला इंसान, दोस्तों के दोस्त। एक ऐसा बेहतरीन खिलाड़ी की उनकी हॉकी की कलाकारी पर साथी तो साथी उनके प्रतिद्वंद्वी तक मुरीद हो जायें। मोहम्मद शाहिद से जो जितनी बार भी मिला उनके मुरीद होता चला गया। यही वजह है कि आज मोहम्मद शाहिद की पांचवी बरसी पर भी उनके निकटतम साथियों और हाकी व खेल जगत से जुड़े लोगों ने उन्हें याद कर  श्रद्धांजलि दी।

पांचवी बरसी पर हाकी  दिग्गजों ने मोहम्मद शाहिद को अर्पित किये श्रद्धासुमन

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हाकी के जानकारों की माने तो हॉकी मैदान पर शाहिद की ड्रिब्लिंग को देखने के लिए हॉकी मुरीद दुनिया के हर कोने में जुड़ते थे। वह गेंद को लेकर अकेले ही गेंद को ड्रिबल करते हुए डॉज कर चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, स्पेन, नीदरलैंड, इंग्लैंड की टीमों की मजबूत से मजबूत रक्षापंक्ति को छका देते थे।

शाहिद गोल करने के लिए हमेशा कलाइयों से तेजी से गेंद को फ्लिक या पुश करते थे। यह बहुत कम देखा कि कभी उन्होंने डी में पहुंच कर हिट लगाकर गोल किया हो। वह करीब एक दशक से ज्यादा तक भारत के लिए अंतर्राष्टीय हॉकी खेले। वहीं 20 जुलाई 2016 को मोहम्मद शाहिद ने अंतिम सांस लेकर हाकी को भी अलविदा कह दिया।

यूपी हास्टल से शुरू की हाकी, तीन ओलम्पिक में लिया हिस्सा

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उनकी याद में लखनऊ के गोमतीनगर में मोहम्मद शाहिद सिथेंटिक हाकी स्टेडियम बनाया गया है। जहां न सिर्फ हाकी का प्रशिक्षण होता है बल्कि यहां हाकी के टूर्नामेंटों का भी आयोजन किया जाता है। दुनिया के बेहतरीन से बेहतरीन डिफेंस को डॉज देने वाले शाहिद बीमारी को डॉज नहीं दे पाये और 56 बरस की उम्र में दुनिया को अलविदा कह कर चले गये।

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शाहिद उन विरले भारतीय हॉकी खिलाडिय़ों में से एक हैं, जिन्होंने घास के मैदान के साथ एस्ट्रोटर्फ  पर बहुत ही कारगर ढंग से गेंद को ड्रिबल कर गोल करने के साथ अपने लंबे करियर में बराबर गोल करने के बेहतरीन मौके मिले।

56 वर्षीय शाहिद ने हॉकी का शुरुआत पाठ बनारस से स्पोटर्स हॉस्टल आने के बाद पूर्व ओलंपियन मरहूम जमनलाल शर्मा से सीखा। मोहम्मद शाहिद ने बनारस की गलियों में हॉकी खेल कर अपने हॉकी को निखारा। बनारस की पहचान गंगा तहजीब की है। शाहिद ने भारत के लिए खेलने उतरने पर हमेशा तिरंगे के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया।

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शाहिद के करीबी अक्सर यह जिक्र करते हैं कि भारत की टीम यदि पाकिस्तान से किसी मैच में हार जाती तो शाहिद की मां घर में खाना नहीं पकाती थी। पाकिस्तान के खिलाफ  नतीजा चाहे जो भी रहा हो शाहिद का खुद का प्रदर्शन हमेशा लाजवाब रहा।

शाहिद ने भारत के लिए 167 मैच खेले और 66 गोल किये। 1990 के पेइचिंग एशियाई खेल उनका भारत के लिए आखिरी टूर्नामेंट था। जानकार बताते हैं कि यदि ऑफ  साइड का नियम शाहिद के समय खत्म हो गया होता तो अंतर्राष्ट्ररीय हॉकी में वो कम से कम पांच सौ गोल दागते।

मोहम्मद शाहिद आक्रमकता में माहिर थे। गेंद पर गजब का कंट्रोल रखने वाले शाहिद से गेंद छीनना लगभग असंभव हुआ करता था। ऊपर से स्पीड उनके खेल में चार चांद लगा देती थी। मैदान के बाहर भी शाहिद जिंदादिल इंसान थे और साथियों का मन बहलाया करते थे।                                                                                                                                                                                 -पूर्व ओलंपियन अशोक ध्यानचंद

अस्सी के दशक में पूरे विश्व में शाहिद के स्टिकवर्क का कोई सानी नहीं था। कैंप के दौरान वह सभी खिलाडिय़ों को शायरी सुनाकर मन बहलाता था। ऐसे में जिंदादिल खिलाड़ी का असमय गुजर जाना दिल को दर्द देता है। पांच बरस गुजर जाने के बाद भी यकीन नहीं होता कि शाहिद हमारे बीच नहीं हैं। 
-पूर्व ओलंपियन सैयद अली

मोहम्मद शाहिद एक महान खिलाड़ी के अलावा बड़े भाई जैसे थे। उनकी कमी को पूरा नहीं किया जा सकता। मैं उनके साथ पटियाला, बंग्लोर में प्रशिक्षण शिविर में तैयारी के बाद एशियन गेम्स में हिस्सा ले चुका हूं। सीनियर खिलाड़ी होने के नाते उनसे बहुत सीख मिली.
-पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी डॉ आरपी सिंह


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